(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.208. अध्यायः 208
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति हरेर्वराहावतारनिरूपणम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-208-0x(6064)(73287)
पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन वृष्णमव्ययमीश्वरम्॥ 12-208-1(73288)
यच्चास्य तेजः सुमहद्यच्च कर्म पुरा कृतम्।
तन्मे सर्वं यथातत्त्वं ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ॥ 12-208-2(73289)
तिर्यग्योनिगतो रूपं कथं धारितवान्प्रभुः।
केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल॥ 12-208-3(73290)
भीष्म उवाच। 12-208-4x(6065)
पुराऽहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थितः।
तत्रापश्यं मुनिगणान्समासीनान्सहस्रशः॥ 12-208-4(73291)
ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्रुरथो मयि।
प्रतिगृह्य च तां पूजां चक्रुरथो मयि। 12-208-5(73292)
कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा।
मनः प्रह्वादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु॥ 12-208-6(73293)
पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः।
बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः॥ 12-208-7(73294)
तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः।
न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम्॥ 12-208-8(73295)
`नराकाद्या महाघोरा हिरण्याक्षमुपाश्रिताः।
उद्योगं परमं चक्रुर्देवानां निग्रहे तदा॥ 12-208-9(73296)
नियुतं वत्सराणां तु वायुभक्षोऽभवत्तदा।
हिरण्याक्षो महारौद्रो लेभे देवात्पितामहात्।
वरानचिन्त्यानतुलाञ्शतशोऽथ सहस्रशः॥' 12-208-10(73297)
दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा।
न शर्म लेभिरे राजन्क्लिश्यमानास्ततस्ततः॥ 12-208-11(73298)
पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन्दिवौकसः।
दानवैरभिसंकीर्णां घोररूपैर्महाबलैः।
भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम्॥ 12-208-12(73299)
`गृहीत्वा पृथिवी देवी पाताले न्यवसत्तदा।
ततस्त्रैलोक्यमखिलं निरोषधिगणान्वितम्।
निःस्वाध्यायवषट्कारमभूत्सर्वं समन्ततः॥' 12-208-13(73300)
अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन्।
कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन्दानवैरभिमर्दनम्॥ 12-208-14(73301)
`हिरण्याक्षेण भगवन्गृहीतेयं वसुन्धरा।
न शक्ष्यामो वयं तत्र प्रवेष्टुं जलदुर्गमम्॥ 12-208-15(73302)
तानाह भगवान्ब्रह्मा मुनिरेव प्रसाद्यताम्।
अगस्त्योऽसौ महातेजाः पातु तज्जलमञ्जसा॥ 12-208-16(73303)
तथेति चोक्त्वा ते देवा मुनिमूचुर्मुदान्विताः।
त्रायस्व लोकान्विप्रर्षे जलमेतत्क्षयं नय॥ 12-208-17(73304)
तथेति चोक्त्वा भगवान्कालानलसमद्युतिः।
ध्यायञ्जलादनिवहं स क्षणेन पपौ जलम्॥ 12-208-18(73305)
शोषिते तु समुद्रे च देवाः सर्षिपुरोगमाः।
ब्रह्माणं प्रणिपत्योचुर्मुनिना शोषितं जलम्।
इति भूयः समाचक्ष्व किं करिष्यामहे विभो॥ 12-208-19(73306)
स्वयंभूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया॥ 12-208-20(73307)
ते वरेणाभिसंपन्ना बलेन च मदेन च।
नावबुद्ध्यन्ति संमूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम्।
वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि॥ 12-208-21(73308)
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः।
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः।
शमयिष्यति तच्छ्रुत्वा जहृषुः सुरसत्तमाः॥ 12-208-22(73309)
ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थितः।
अन्तर्भूमिं संप्रविश्य जगाम दितिजान्प्रति॥ 12-208-23(73310)
दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्वममानुषम्।
प्रसह्य तरसा सर्वे संतस्थुः कालमोहिताः॥ 12-208-24(73311)
ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम्।
संक्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः॥ 12-208-25(73312)
दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छ्रिताः।
नाशक्नुवंश्च किंचित्ते तस्य कर्तुं तदा विभो॥ 12-208-26(73313)
ततोऽगच्छन्विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा।
संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रशः॥ 12-208-27(73314)
ततो देवाधिदेवः स योगात्मा योगसारथिः।
योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम॥ 12-208-28(73315)
विननाद महानादं क्षोभयन्दैत्यदानवान्।
सन्नादिता येन लोकाः सर्वाश्चैव दिशो दश॥ 12-208-29(73316)
तेन सन्नादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत्।
संश्रान्ताश्च दिशः सर्वा देवाः शक्रपुरोगमाः॥ 12-208-30(73317)
निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा।
स्थावरं जङ्गमं चैव तेन नादेन मोहितम्॥ 12-208-31(73318)
ततस्ते दानवाः सर्वे तेन नादेन भीषिताः।
पेतुर्गतासवश्चैव विष्णुतेजः प्रमोहिताः॥ 12-208-32(73319)
`त्रस्तांश्च देवानालोक्य ब्रह्मा प्राह पितामहः।
योगेश्वरोऽयं भगवान्वाराहं रूपमास्थितः।
नर्दमानोऽत्र संयाति मा भैष्ट सुरसत्तमाः॥ 12-208-33(73320)
एवमुक्त्वा ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे पितामहः।
देवता मुनयश्चैव विष्णुं वै मुक्तिहेतवे॥ 12-208-34(73321)
ततो हरिर्महातेजा ब्रह्माणमभिनन्द्य च।'
रसातलगतश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम्।
खुरैर्विदारयामास मांसमेदोस्थिसंचयान्॥ 12-208-35(73322)
नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः।
पद्मनाभो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः॥ 12-208-36(73323)
ततो देवगणाः सर्वे पितामहमुपाद्रवन्।
तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्चैव जगत्पतिम्॥ 12-208-37(73324)
नादोऽयं कीदृशो देव नेतं विद्म वयं प्रभो।
कोसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत्।
देवाश्च दानवाश्चैव मोहितास्तस्य तेजसा॥ 12-208-38(73325)
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्वाराहं रूपमास्थितः।
उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभिः॥ 12-208-39(73326)
पितामह उवाच। 12-208-40x(6066)
`दिव्यं------ युद्धमासीन्महात्मनोः।
हिरण्याक्षस्य विष्णोश्च सर्वसंक्षोभकारणम्॥ 12-208-40(73327)
जघान च हिरण्याक्षमन्तर्भूमिगतं हरिः।
तदाकर्ण्य महातेजा ब्रह्मा मधुरमब्रवीत्॥' 12-208-41(73328)
पीतामह उवाच। 12-208-42x(6067)
निहत्य दानवपतीन्महावर्ष्मा महाबलः।
एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः॥ 12-208-42(73329)
सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथाऽऽत्मनः।
स्थिरीभवत कृष्णोऽयं सर्वविध्नविनाशनः॥ 12-208-43(73330)
कृत्वा कर्मातिसाध्वेतदशक्यममितप्रभः।
समायातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः॥ 12-208-44(73331)
पद्मनाभो महायोगी पुराणपुरुषोत्तमः।
न संतापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमैः॥ 12-208-45(73332)
विधिरेष प्रभावश्च कालः संक्षयकारकः।
लोकान्धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना॥ 12-208-46(73333)
स एष हि महाबाहुः सर्वलोकनमस्कृतः।
अच्युतः पुण़्डरीकाक्षः सर्वभूतादिरीश्वरः॥ ॥ 12-208-47(73334)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 208॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-208-36 भूताचार्यः स भूतराट्र इति झ. ड.थ. पाठः॥


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